आखिर कविता वासनिक पद्मश्री से वंचित क्यूँ……?

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पद्मश्री क्यों दिया जाता हैं…..
पद्मश्री भारत सरकार द्वारा आम तौर पर सिर्फ भारतीय नागरिकों को दिए जाने वाला सम्मान है। जो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों जैसे की कला, शिक्षा,उद्योग, साहित्य,विज्ञान,खेल, चिकित्सा,समाज सेवा और सार्वजनिक जीवन आदि में उनके विशिष्ट योगदान को मान्यता प्रदान करने के लिए दिया जाता है। भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाला यह सर्वोच्च सम्मान है। इस सम्मान के साथ ही सम्मानित व्यक्ति के नाम के पूर्व पद्मश्री जोड़कर उनका नाम संबोधित किया जाता है। अब तक जिन छत्तीसगढ़िया को इस सम्मान से नवाजा गया है उनमें डॉक्टर द्विजेंद्रनाथ मुखर्जी सन 1965 में चिकित्सा के क्षेत्र में, पंडित मुकुटधर पांडे सन 1976 साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र के लिए, हबीब तनवीर सन 1983 में कला जगत के क्षेत्र के लिए, तीजन बाई सन 1987 में पंडवानी लोकगीत नाटक की पहला महिला कलाकार के लिए कला क्षेत्र में, राजमोहिनी देवी सन 1989 में शराबबंदी के तहत सामाजिक कार्य के क्षेत्र के लिए, धर्मपाल सेन सन 1992 में सामाजिक कार्य आदिवासी बच्चों के लिए शिक्षा अभियान के तहत, डॉ अरुण त्र्यंबक दाबके सन 2004 में चिकित्सा के क्षेत्र के लिए, पुनाराम निषाद सन 2005 कला क्षेत्र में, मेहरून्निसा परवेज सन 2005 में शिक्षा एवं साहित्य क्षेत्र के लिए, डॉक्टर महादेव प्रसाद पांडे सन 2007 में शिक्षा एवं साहित्य क्षेत्र में, जान मार्टिन नेल्सन सन 2008 कला जगत मूर्तिकार के रूप में, गोविंदराम निर्मलकर सन 2009 कला जगत के लिए, डॉक्टर सुरेंद्र दुबे सन 2010 शिक्षा एवं साहित्य क्षेत्र के लिए, सत्यदेव दुबे सन 2011 कला एवं रंगमंच के क्षेत्र के लिए, डॉक्टर पुखराज बाफना सन 2011 चिकित्सा के क्षेत्र में, शमशाद बेगम 2012 महिलाओं को साक्षर बनाने के लिए, फूलबासन यादव सन 2012 में महिलाओं के स्वरोजगार के लिए, स्वामी जीसीडी भारती सन 2013 (सूफी गायन) कला क्षेत्र के लिए, अनुज शर्मा सन 2014 में छत्तीसगढ़ी सिनेमा में चर्चित अभिनेता के लिए, सबा अंजुम सन 2015 खेल जगत के लिए, शेखर सेन सन 2015 कला जगत के लिए, ममता चंद्राकर सन 2016 (छत्तीसगढ़ की लोक गायिका) कला क्षेत्र के लिए, अरुण शर्मा सन 2017 पुरातत्व के क्षेत्र के लिए, पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी सन 2018 शिक्षा एवं साहित्य के लिए, तथा दामोदर गणेश बापट को सन 2005 में कुष्ठ पीड़ितों की सेवा के लिए व मदन चौहान को कला के क्षेत्र के लिए तथा वर्तमान में डॉ राधेश्याम बारले को सन 2021 के लिए कला क्षेत्र के तहत चयनित किया गया है।बशर्ते इन सभी नामों के बीच यदि श्रीमती कविता वासनिक को तवज्जो दी जाती तो यह छत्तीसगढ़ के लिए गौरव की बात होती।

इतिहास के पन्नों में…
छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक आंदोलन के इतिहास की ओंर हम यदि रुख करें तो संस्कारधानी राजनांदगांव की धरोहर कविता वासनिक का योगदान महत्वपूर्ण रहा है।विभिन्न सम्मान से अलंकृत, समर्पित भाव लिए जिस कला साधक ने बाल्यकाल से लोक यात्रा के लिए समर्पित भाव लिए इस दिशा में अपनी महती की भूमिका निभाई है।वह निश्चित तौर पर इस सम्मान की हकदार है।फिर क्यूँ उन्हें इस सम्मान से दरकिनार किया जाता है।यह संस्कारधानी के लोक कलाकारों के लिए एक प्रश्नचिन्ह है।

 कविता वासनिक की रही अहम भूमिका….

छत्तीसगढ़ का सांस्कृतिक इतिहास अपने आप में एक विशाल सागर की भाँति है। इसी सागर से कुछ रत्नों ने छत्तीसगढ़ निर्माण के पूर्व सांस्कृतिक क्रांति में अपना अहम योगदान दिया। सांस्कृतिक क्रांति के इस समर में कलाकारों और साहित्यकारों की भी अहम भूमिका रही।तो वहीं कलाकारों साहित्यकारों और कलमकारों की अहम भूमिका के साथ ही गीतकारो और संगीतकारों ने अपने कला कौशल से दर्शकों के बीच ठेठ छत्तीसगढ़िया होने की सुखद अनुभूति कराई है।इसी समयांतर छत्तीसगढ़ी गीत संगीत का रुतबा जब… माया नगरी मुंबई से रिकॉर्ड होकर श्रीमती कविता वासनिक के स्वर तथा स्व खुमान साव के संगीत निर्देशन में (पता लेजा रे… पता दे जा रे गाड़ीवाला)गीत ने छतीसगढीयाँ जनमानस के बीच अपनी गहरी धरोहर बनाई तो हर छत्तीसगढ़ियां अपने आप को गौरवान्वित महसुस करने लगा।

जो हकदार है…इस सम्मान की…..

आलेख की शुरुआत पर नजर डालते हुए यदि हम बढ़ते हैं तो… लगभग 70 के दशक के साथ ही छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक क्रांति का पदार्पण हो चला था, छत्तीसगढ़ स्थित ग्राम- बघेरा के स्वर्गीय रामचंद्र देशमुख ने कला यात्रा का शंखनाद करते हुए छत्तीसगढ़िया जनमानस को मनोरंजन के साथ- साथ छत्तीसगढ़ियां के स्वाभिमान को जगाने के लिए अपना अथक प्रयास लिए लोकयात्रा के सफरनामा को मूर्त रूप देने के उद्देश्य के साथ (चंदैनी गोंदा) का निर्माण किया। जिसमें संगीतकार के रूप में स्व. खुमान लाल साव एवं साथी कलाकारों में स्व,गिरजा सिन्हा, स्व,संतोष टाँक के साथ स्व,भैयालाल हेड़ाउ श्रीमती अनुराग ठाकुर और श्रीमती कविता हिरकने वर्तमान में(वासनिक) का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अब जब चंदैनी गोंदा के प्रारंभ से ही जिसने अपने सुरों और आस्था के साथ छत्तीसगढ़ की माटी वंदना, करमा, ददरिया, फुगड़ी, सुवा, आदि कला संस्कृति को जिस लोक गायिका ने पहचान दिलाई क्या-? वह पद्मश्री अलंकरण की हकदार नहीं है यह छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था और नामों की फाइल आगे बढ़ाने वाले हूजूमदारो पर निर्भर है।

जो सम्मान से अलंकृत हैं.. वो भी है पक्ष में…..

छत्तीसगढ़ की जनता के लिए कविता वासनिक एक जाना पहचाना नाम है।विगत 40 वर्षों से अनुराग धारा लोक सांस्कृतिक मंच के माध्यम से लोक कला की सेवा के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी कला, संवर्धन व संस्कृति के लिए श्रीमती कविता वासनिक सतत प्रयासरत है।विगत 70 के दशक से जिस लोक गायिका ने अपने निस्वार्थ संगीत साधना को छत्तीसगढ़ियां कला मर्मज्ञों को समर्पित किया है। क्या-? वह छत्तीसगढ़ प्रतिनिधितत्व के साथ पद्मश्री की हकदार नहीं है। यह विषय उनके प्रशंसकों को गत कुछ अरसे से कचोट रहा है। दबी जबान से यदि कहा जाए तो जो पद्मश्री से अलंकृत है, उनकी भी पहली पसंद श्रीमती कविता वासनिक ही है। फिर भी ना जाने क्यों हर बार मंजिल के करीब के पास ही उन्हें हर वर्ष हार माननी पड़ती है।यह शोध का विषय है।

कलम की अंतिम थकान के साथ….

भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाला पद्म श्री सम्मान किसी योग्य व्यक्ति को उसके विशेष योगदान के लिए दिया जाता है। अब प्रश्न यह है कि छत्तीसगढ़ में कविता वासनिक का जो योगदान रहा है। वह किसी पद्मश्री सम्मान से कम नहीं है। पूर्व में भी सन 2017 में उन्हें “छतीसगढ़ राज्य अलंकरण सम्मान” से लोक कला के क्षेत्र के लिए महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। वहीं छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास पर यदि गौरनामा में देखा जाए तो छत्तीसगढ़ी कला संस्कृति की यात्रा के लिए कविता वासनिक का नाम पद्मश्री के लिए स्पष्ट है। फिर ना जाने क्यों-? उन्हें इस सम्मान से वंचित रखा जा रहा है। यह छत्तीसगढ़ कला जगत के लिए सोच और चिंता का विषय है।

रवि रंगारी की कलम से……

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